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Sunday, June 9, 2013

मुझको बना के रख लो टाइम पास का बहाना ................................................................

खुद भी देखो यारों देखेगा अब जमाना , मुझको बना के रख लो टाइम पास का बहाना 
      मुफलिसी है मेरे पास गुजरे ज़माने की , नही पड़ेगी जरूरत और कोई हंसाने की 
कंकर उठा के साधो बन जाऊंगा निशाना , मुझको बना के रख लो ...............

नादाँ हूँ मै भोला हूँ हंसते हुए रोता हूँ 
       खाता हूँ गम के रोटी , जागते हुए सोता हूँ 
बन जाऊंगा हकीकत जो था कभी फ़साना 
मुझको बना के रख .......................................................................................

दुनिया की चकाचौंध में मै खो नही सकता 
   कर लो भी सितम जितने मै रो नही सकता 
महफ़िल में हो नुमाइश 
  अजी तब हमें नचाना 
मुझको बना के रख लो ...............................................................................

जितनी भी दोगे चोटें आहें नही भरूँगा 
      मर मर के जी रहा हूँ जी जी के क्या मरुंगा 
जख्मे जिगर को अर्जुन अब तुमसे क्या दिखाना 
मुझको  .........................................................

हमने तो गँवा डाली इशारे में जिन्दगी 
    कोई कहे पूजा कोई कहे वन्दगी 
दुनिया कहे पागल तुम कह लो दीवाना 
   मुझको बना के रख लो .................................

मेरे मित्र डॉक्टर मुकेश कुमार सिंह ( अर्जुन ) की एक रचना 

Sunday, April 8, 2012


कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .

एक दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .

जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .

हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .

जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .

एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .

यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं